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अब तेरी हर वो बातें याद आती हैं माँ
जब तू कहै करती थी, ‘ अब तो बड़ी हो जा , संभल जा ‘
सुबह कम्बल समेटा करती थी, मेरे बाल बनाया करती थी
कितनी कोशिस की तूने मुझे इस दुनिया से महरूम करने की
मुझे लगता था तू हर वक़्त तो होगी ही न सब ठीक करने के लिए?
तू है अब भी है किसी रूप में है पर मैं ही न समझ पायी तुझे
कितनी कोशिशे की मैंने माँ खुदको समझाने की
पर ये ढीट मन आज भी न संभालता है
रसोई में जब तूने टूटी रोटी देखि
तूने बेलन से मारा था, आज समझती हूँ की क्यों
क्यों जरुरी था उस रोटी का पूरा गोल होना
क्यों जरुरी था वक़्त पर संभालना
क्यों तू सारा दिन पीछे पड़ी रहती थी
आज जब सब टुटा तो ये मोह छूटा
आज आज़ाद हु पर कही न कही वो बंधन आज भी सताती है
दुसरो को जब बढ़ते देखती हु तो तेरी वो बातें याद आती  है
सेहमी कही कमरे में मैं अंधेरो को ताड़ते हुए तुझे खोजती हूँ
कही किसी की आवाज में जब वो मेहरुमता होती है तुझे ढूंढ़ती  हु
तू ही जाने मुझपर क्या बीत रही है
तू ही पहचाने हैं मुझे माँ,
आज मन कितना बैचेन है, न सांस का प्यार न पति का प्यार मुझे भाये है
ये जबरदस्ती का बंधन अब चुभता है और न चाहने से भी बदलता है
ये कैसे कोशिस है की बचपन फिरसे लौट आये
और जब मेरी आंखे खुले तो तू मेरा सर सहलाये
कह दे ये सब झूट है, सब वैसा है ही अब भी बस नींद ज्यादा है

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