माँ, वो एक माँ

माँ , हर वो शब्द जो तुमसे शुरू होता है,
आमीन, दुआ सा होता है
वो सब जानती है फिर भी कहती है, क्या हुआ, ऐसे उदास क्यों है?
शायद ये उसकी परछाई है जो जिन्दा रखती है
माँ, हर वो वक़्त जो तुमसे शुरू होता है
आमीन, अच्छा होता है
राह भटके मैं कई बार जब घर ना आ पाया
तूने अँधेरे में मुझे रौशनी दी है
कैसे बताऊ की मेरी भूख-प्यार तुझसे है
जब मैं घर छोड़ जाता हू
तू रोती है
जाने मैं कैसे रहूँगा, क्या खाऊंगा, कहा सोऊंगा
यही सोच-सोच दुबली होती है
और उसके कुछ दिन खुद भूखे सोती है
ये कैसा प्यार है तेरा कभी कभी समझ भी न पाए
हम मूरख कहा तेरी महिमा जान पाए
वो एक दिन जब तुझसे घर रख कमाने गया
तेरी आँखै नम और मेरा वो मन
आज भी माँ जब भी तेरा स्वाद चकता हू
मन ही मन खुदको कामयाब पता हू
किस घडी जो तूने मुझे अपनाया
मुझ जैसे पराये को अपना बनाया
तेरी गोद में मेरा सारा जीवन है मेरी माँ
फिर भी आज ये शब्द न जाने डगमगाते है
तेरी दुआ हर जर्रे को इंसान बनाते है
हाँ माँ, ऐसे ही होता है
बस तुझे ही खुद का ध्यान नहीं होता है
यह सोच कर तेरा ये बेटा कितना उदास होता है
काश एक बार मैं ख़ुदा को देखता
फिर कहता उनसे देख मेरे पास तुझ जैसी मूरत है
मेरी माँ की एक वो जो चाबी, वो जो सूरत है
आमीन, वो जो चाबी, वो जो सूरत है

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4 thoughts on “माँ, वो एक माँ

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